वैश्विक कोरोना महामारी से बचाव के रूप में सोशल डिस्टेंसिंग के धार्मिक एवं सांस्कृतिक सम्प्रत्यय का अध्ययन

 

प्रस्तावना-

भारत सहित आज दुनिया के लगभग सभी देश कोरोना वायरस की विभीषिका का सामना कर रहे हैं। इसके संक्रमण से बचने के लिए "सोशल डिस्टेंस" को आशा भरी नजर से देखा जा रहा है। सभी से यह उम्मीद की जा रही है कि, वे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें, भीड़भाड़ से बचें, जिससे तेजी से फैल रहे वायरस के संक्रमण को कम किया जा सके|
     चीन के वुहान प्रांत से शुरु हुआ यह विषाणु आज संपूर्ण विश्व को संक्रमित कर चुका है। विश्व के विकसित देश, जिनकी स्वास्थ्य व्यवस्था अत्यंत उन्नत है, उनको भी कोरोना महामारी ने असहाय कर दिया है। ऐसे में जब इस आपदा का कोई समाधान नहीं मिल रहा है, "सोशल डिस्टेंसिंग" को मानना और इसका पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है| कोविड-19 के पूर्व संपूर्ण दुनिया पहले भी महामारीयो का दंश झेल चुकी है। इलाज के अभाव में लाखों लोग जान गवा चुके हैं। जैसे- प्लेग, चेचक, हैजा/कालरा, स्वाइन फ्लू, सार्स इत्यादि। भारत के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि, हम भारतीय महामारीओं के संपर्क में बहुत कम ही आए हैं। भारतीय इतिहास में सबसे अधिक मौतें 18वीं सदी में हैजों की वजह से हुई है। इन महामारीओं की प्रकृति प्रायः स्थानीय ही रही है, क्योंकि भारतीय समाज में निजी जीवन में शुद्धता, सुचिता और पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता रहा है| बड़े पैमाने पर लोग एक दूसरे के संपर्क में कम आते रहे हैं। कारण चाहे जो हो संचार साधनों का अभाव, स्थानीय धर्म-संप्रदाय रीति-रिवाजों का आग्रह, बाहरी लोगों से दूरी, जातीय अस्पृश्यता अथवा मध्य युग में समुद्र पार न जाने की मान्यता इत्यादि।

नोवल कोरोना वायरस का हमारे शरीर में प्रवेश करने का तरीका एवं सामान्य लक्षण-

कोविड-19 विषाणु हमारे शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचता है। यहां तक वह विभिन्न माध्यमों जैसे खाँसने, थूकने, छूने या स्पर्श करने से यह हमारे गले, सांस की नली और फेफड़ों को संक्रमित करता है।
अधिकांश लोगों में बीमारी के दौरान सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं। जैसे- बुखार, खांसी, शरीर में दर्द, गले में खराश तथा सिरदर्द। ये सभी इसके सामान्य लक्षण हैं, लेकिन इन लक्षणों की अनुपस्थिति भी हाल के दिनों में मरीज में देखी गई है। वायरस के अटैक के प्रारंभिक दौर में बिना बलगम वाली सूखी खांसी भी आती है|

क्वॉरेंटाइन की प्राचीनता-

सामान्य रूप से देखा जाए तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान, धर्म-शास्त्र एवं चिकित्सा-शास्त्र में क्वॉरेंटाइन का महत्व पहले से ही बताया गया है।
मनुस्मृति की व्यवस्था है कि, "ना धार्मिक वसेद ग्रामे न व्याधि बहुले भृशम" (4-60)
अर्थात अधार्मिक ग्राम (क्षेत्र) में, चेचक, हैजा, प्लेग, मलेरिया इत्यादि सांसर्गिक व्याधिग्रस्त क्षेत्र में निवास नहीं करना चाहिए| मनुस्मृति आगे कहती है कि, "सांसर्गिक दूषण से दूर रहने की भावना से, अन्यों के जूते-चप्पल, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, माला, जल-पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।" (4-66)
"मल, मूत्र, थूक, वमन, अपवित्र पदार्थ, रक्त/विष तथा विषाक्त वस्तु जल में अथवा जलादि वर्जित स्थलों में न छोड़ें।" (4-56)
सनातन हिंदू धर्म हजारों वर्षों से संक्रमण से बचाव के तरीकों को प्रयोग में लाता रहा है। आज दुनिया के देश इसे अपनाने को विवश हो रहे हैं। मनुस्मृति कहती है कि, "नाक-मुंह-सिर को ढक कर, मौन रहकर मल/मूत्र का त्याग करना चाहिए" 4-49
"दूसरों के कपड़े नहीं पहनना चाहिए" (104-86) महाभारत अनुशासन पर्व
"स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः सभी कार्य स्नान करके ही करना चाहिए।" बाधूलस्मृति-69
धर्मसिंधु कहता है कि, "नमक, घी तेल, कोई भी व्यंजन, पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे जाएं तो न ग्रहण करें|"
"श्मसान में जाने पर, बमन होने पर, बाल कटवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।" विष्णु स्मृति-22
इस प्रकार के अनगिनत प्रमाण हमारे धर्म शास्त्रों में शुचिता और पवित्रता हेतु दिए गए हैं, जिसका किसी न किसी रूप में पालन आज तक होता आ रहा है। आज आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान तथा अपने आप को अत्यधिक उन्नत कहलाने वाला पश्चिम जगत नोवल कोरोना वायरस से बचाव हेतु इन उपायों को अपनाने की कोशिश कर रहा है|
क्वॉरेंटाइन के रूप में हमारे हिंदू धर्म में सूतक/पातक अशौच लगता है। सूतक मातृशक्ति से सम्बंधित है, जबकि पातक पितृशक्ति से सम्बंधित है| दोनों अशौचों के मूल में, वही हाइजीन सेंस है, जो एक सर्जन सर्जरी के दौरान अपनाता है। आप बाहर के जूते या कपड़े नहीं पहन सकते, क्योंकि इनसे इंफेक्शन होने का खतरा बना रहता है। लेकिन कालांतर में इसी हाइजेनिक सेंस को छुआछूत या अस्पृश्यता के नाम से फैलाया गया और इससे हिंदू धर्म के विरोध का मार्ग भी प्रशस्त किया गया। इस कार्य में ईसाई मिशनरियों एवं वामपंथी बुद्धिपिशाचों का विशेष योगदान रहा है। इसके साथ ही कुछ अपने लोगों ने भी कल्पनाजन्य बातें फैलाई जिससे हिंदू समाज विघटित हुआ। वामपंथी और कुछ राजनीतिक मृग-मरीचिकाओं के दुष्चक्र में सनातनी परंपराओं पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया और इसके प्रति अनादर का भाव विकसित करते हुए समाज में विष घोलने का कार्य किया गया|
     गरुण पुराण के अनुसार सूतक अथवा पातक वह समयावधि है, जब एक व्यक्ति को एक निश्चित समय/अवधि तक शुभ कार्यों को करने, लोगों से मिलने-जुलने से रोका जाता है। न केवल उस व्यक्ति को बल्कि उसके सभी रक्तसम्बन्धियों को भी इसी दायरे में लाते हुए ऐसा करने से वर्जित किया गया है|
विधर्मीयों की दृष्टि में यह अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा हैं, लेकिन इसके पीछे की मूल भावना व्यक्ति को सिर्फ सामाजिक गतिविधियों से अलग-थलग करना ही है। शुद्धिकरण के पश्चात ही वह सबसे मिलजुल सकता है। यह सेनीटाइजेशन नही तो और क्या है?

क्वॉरेंटाइन और आइसोलेशन के शब्दभ्रम का निवारण-

अ- क्वॉरेंटाइन-
क्वॉरेंटाइन शब्द में, स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति को निःसंग करने का भाव है। इतालवी भाषा में क्वारण्टा का अर्थ है, 40 ।
भाव यह है कि, व्यक्ति के भीतर के शारीरिक-मानसिक दूषण एक निश्चित समय में उस व्यक्ति का आश्रय छोड़ देते हैं, यदि वह निःसंगता का जीवन व्यतीत करें| क्वॉरेंटाइन उन व्यक्तियों के लिए है, जो बीमार नहीं है लेकिन उनके बीमार होने का खतरा हो सकता है|
क्वॉरेंटाइन लैटिन मूल का शब्द है जो Quadraginta से आया है, जिसका अर्थ 40 से है| 16वीं सदी में ब्रिटेन के एक जहाजी बेड़े को संक्रामक बीमारी से ग्रसित एक शहर के किनारे नहीं रोका गया क्योंकि यहाँ पर प्लेग फैला हुआ था। यहीं से अंग्रेजी में क्वॉरेंटाइन शब्द प्रचलन में आया|

ब- आइसोलेशन-
आइसोलेशन, बीमार व्यक्तियों को विलग रखने की व्यवस्था है। इससे किसी बीमारी के दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में फैलने की आशंका को कम किया जा सकता है। इससे विषाणु का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रवेश अवरुद्ध किया जा सकता है| आइसोलेशन शब्द आइसलैंड (द्वीप) शब्द से बना है। 1423 ईस्वी में इटली के वेनिस के एक द्वीप में एक बड़ा अस्पताल प्लेग के रोगियों के लिए बनाया गया था। आइसलैंड पर बने  होने के कारण आइसोलेशन शब्द प्रचलन में आया|

सोशल डिस्टेंसिंग-
वर्तमान दौर में नोवल कोरोना वायरस के दीर्घकालिक प्रभाव और संक्रमण से बचने के लिए सोशल डिस्टेंस (फिजिकल डिस्टेंस) पर अधिक जोर दिया जा रहा है| आज समय की मांग है कि, सामाजिक संपर्क को कम किया जाए, जिससे कि विषाणु के पैनिक अटैक को कम किया जा सके। नोवल कोरोना का विषाणु अति संक्रामक है, हमारी थोड़ी भी असावधानी अथवा लापरवाही इसके हजारों/लाखों रोगी रक्तबीज की तरह पैदा कर सकती है। इस विषय में एक बात और उल्लेखनीय है कि, यह बीमारी उस रोगी को, जिसे हम ठीक समझ रहे हैं, पुनः उसमें दोहराने की क्षमता से युक्त है| कुछ लोग इसे सामान्य इन्फ्लूएंजा की भांति समझ रहे हैं, यहां यह स्पष्ट कर देना अत्यंत आवश्यक है कि, कोरोना का यह नया संस्करण "कोविड-19" सामान्य इन्फ्लूएंजा से लगभग 10 गुना अधिक तीव्रता से युक्त है। अतः अज्ञात मानव संपर्क, ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने-जुलने की गतिविधियों पर हमें रोक लगानी होगी|
    हम जानते हैं कि मानव एक सामाजिक प्राणी है। मानव, समाज से विलग नहीं रह सकता है। हमारा संपूर्ण ताना-बाना मेलमिलाप पर ही निर्भर है। फिर भी कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज को क्वॉरेंटाइन किया जाता है अर्थात ऐसे व्यक्ति को दूसरे लोगों से तब तक आइसोलेट रखा जाता है, जब तक कि वह पूर्णतः स्वस्थ न हो जाए|
    इसी धारणा पर कार्य करते हुए न केवल भारत, बल्कि दुनिया के उन सभी देशों ने, जहां पर इस बीमारी के फैलने की तीव्रता की आशंका है, उन्होंने लोगों को अपने घरों में रहने को कहा है और इस अवधि में "स्टे होम" और "वर्क फ्रॉम होम" की अवधारणा को आगे बढ़ाया हुआ है।
     भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने अपने अध्ययन में बताया है कि, एक संक्रमित मरीज 30 दिनों में 406 लोगों को संक्रमित कर सकता है। आईसीएमआर आगे कहता है कि, अगर सामाजिक दूरी और लाक डाउन नही किया गया तो, स्थिति नियंत्रण से परे हो सकती है।
      सोशल डिस्टेंस का आशय, लोगों से दूरी बनाए रखना अर्थात सामाजिक अलगाव है। भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर जाने, सामाजिक/सार्वजनिक, धार्मिक, पारिवारिक कार्यक्रमों में भीड़ की अधिकता होती है, ऐसी स्थिति में संक्रमण का अधिक खतरा होता है और कोरोना का पैनिक अटैक अप्रत्याशित हो सकता है। ऐसी स्थिति में सोशल डिस्टेंस ही एकमात्र समाधान बचता है, जिसे अपनाकर कोई स्वस्थ व्यक्ति, स्वयं को तथा अपने परिवार को भी संक्रमण से मुक्त रख सकता है|
     प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सोशल डिस्टेंसिंग को परिभाषित करते हुए कहा है कि, "संयम का तरीका क्या है? भीड़ से बचना, घर से बाहर न निकलना, आजकल जिसे सोशल डिस्टेंसिंग कहा जा रहा है। कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के इस दौर में यह बहुत ही आवश्यक है|"
    हम आज देख रहे हैं कि, 20वीं सदी में आकर पश्चिमी जगत के लोग हमें पढ़ा रहे हैं कि, आइसोलेशन एवं क्वॉरेंटाइन का समय 14 दिन होना चाहिए। वह हमें ऐसा पढ़ा सकते हैं, क्योंकि हम स्वयं सोचते हैं कि, हिंदू धर्म अंधविश्वास से भरा हुआ है और अवैज्ञानिक धर्म है। जो आज हमें पढ़ाया जा रहा है, बताया जा रहा है, उसे हमारे पूर्वज हजारों साल पहले से ही जानते थे| ये बातें हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के समृद्धि का प्रतीक भी हैं।

सोशल डिस्टेंसिंग के दौरान ध्यान देने योग्य बातें-
1- घर पर रहना, बेवजह घर से बाहर, मार्केट, गली-मोहल्ले या किसी भी स्थान पर न जाना|
2- अत्यंत आवश्यक वस्तुओं या जीवन रक्षक वस्तुओं की आवश्यकता पर ही बाहर निकलना तथा इस दौरान 1 से 2 मीटर तक की दूरी रखना|
3- बाहर आने-जाने पर मास्क/गमछा, सैनिटाइजर और हैंडवाश जैसी जरूरी एतिहात/सावधानी बरतना।
4- वरिष्ठ नागरिकों एवं बच्चों की विशेष देखभाल करना, क्योंकि इनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और इनमें संक्रमण तेजी से फैल सकता है|
5- किसी व्यक्ति को बुखार, खांसी जैसे लक्षण यदि दिखे तो छींक एवं थूक के सीधे संपर्क में आने से बचना|
6- आपसी संपर्क जैसे हाथ मिलाने, गले मिलने से बचना|
7- मेज, कुर्सी, दरवाजे के हैन्डल आदि इत्यादि को छूने से बचना|

उपसंहार-
भारत के लिए कोरोना संकट एक अप्रत्याशित संकट है। इस वजह से हुए लाकडाउन ने लोगों को अप्रत्याशित दौर में ढकेल दिया है लेकिन इसने कुछ आश्चर्यजनक फायदे दिखाएं हैं, वे ध्यान देने योग्य है। भारत में अपराधों में कमी आ गई हैं, पुलिस की मुस्तैदी से लोगों के घरों में रहने से अपराध पर अंकुश लग गया है। गंगा सहित दूसरी नदियां स्वच्छ हो गई हैं। लोगों के स्वास्थ्य दशाओं में सुधार आ गया है। उन्हें मानसिक, शारीरिक संतुष्टि का अनुभव मिल रहा है जिससे उनकी व्याधियों/गंभीर रोगों में भी राहत मिल रहा है| हम पर्यावरण में बदलाव को साफ-साफ देख सकते हैं। कई दशकों बाद हमें स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी मिल रहा है। यह सबसे बड़ा अनुभव है। कोरोना संकट से हमें जो सबक मिल रहे हैं, उनसे सीखना होगा, इन पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।

  अंतिम में मै कहना चाहता हूँ कि, हम जानते हैं कि, भारतीय लोकतंत्र का ढांचा भारत के सामाजिक व्यवस्थाओं पर ही टिका हुआ है और यह सामाजिक व्यवस्था धर्म और अध्यात्म से अभिप्रेरित है| मानव स्वभाव बदल जाते हैं लेकिन धर्म और मूल्य, परंपराएं जस के तस बने रहते हैं। ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते रहते हैं। भारतीय परंपराएं, धार्मिक विश्वास एवं सामाजिक न्याय को अक्षुण्ण बनाती हैं। हमें स्वच्छता और शिष्टाचार इन्हीं परंपराओं से मिला हुआ है। हाथ जोड़कर नमस्ते करना, घर में घुसने से पहले हाथ-पैर साफ-साफ धोना इत्यादि। योग-प्राणायाम हमारे व्यवहार का अंग रहा है, इन्हीं के जरिए स्वयं को हम संक्रमण से बचाते आ रहे हैं।
  इस सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के दौरान एक बात और हमें ध्यान रखने की जरूरत है कि, हम लोगों से भावनात्मक रूप से दूर न हो अन्यथा हमारा संपूर्ण ताना-बाना ही टूट जाएगा। कोविड-19 मानवता के लिए अवसर भी हो सकता है कि, हम अपने आंतरिक तल की गहराइयों से एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े रहें|

सन्दर्भ ग्रन्थ-
1- राधकृष्णन- धर्म औऱ समाज (मूल रूप में) विवेक प्रकाशन, नई दिल्ली
2- रामसुखदास- मानवमात्र के कल्याण के लिए, गीताप्रेस गोरखपुर
3- लाल, रमन बिहारी- शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय सिद्धांत, रस्तोगी प्रकाशन- मेरठ
4- आरोग्य सेतु एप्पलीकेशन
5- WHO & ICMR एवं केंद्र- राज्य सरकार की एडवाइजरी


प्रस्तुतकर्ता-
अमित कुमार पाण्डेय


M.A. (राजनीति शास्त्र, शिक्षा शास्त्र एवं हिंदी) B.Ed. & नेट (शिक्षा शास्त्र)

शोध छात्र- शिक्षा शास्त्र
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु,
सिद्धार्थ नगर- उत्तर प्रदेश

मोबाइल- 9451173282

पता- मकान नम्बर 89, श्री गोरक्षनगर कालोनी, सिंघड़िया, कूड़ाघाट गोरखपुर उत्तर प्रदेश 273008

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