⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳ 🚩🦚🌹🐌🐄🐌🌹🦚🚩 अषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, *पँचमी*, शतभिषा नक्षत्र, सूर्य उत्तरायण, ग्रीष्म ऋतु, युगाब्ध ५१२३, विक्रम संवत-२०७८, मंगलवार, 29 जून 2021. 🕉~~~~~~~~~~~~~🕉 *प्रभात दर्शन -* ~~~~~~~ "पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो और कार्य करो। एक महत्वपूर्ण बात यह कि सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उतपन्न होगी और इससे हर चीज नष्ट हो जायेगी। आगे बढ़ो, तुमने बहुत अच्छा कार्य किया है। हमे अन्य की सहायता की प्रतीक्षा किये बिना, अपने भीतर से ही सहायता लेनी चाहिए। आत्मविश्वासी, सच्चे, कर्तव्यनिष्ठ एवं सहनशील बनो। फिर देखो ! एक समृद्ध, शक्तिशाली भारत आपके सामने है। *--स्वामी विवेकानंद* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *🚩आपका दिन मंगलमय हो🚩* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~
संदेश
जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
डेल्टा प्लस का खतरा
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
कें द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की इस घोषणा के साथ स्वास्थ्यकर्मियों सहित आम लोगों के मन में भय मिश्रित चिंता व्याप्त हो गई है कि देश के कुछ हिस्सों में कोविड-19 विषाणु के नये स्वरूप के करीब 40 मामले सामने आए हैं, जिसे चिंताजनक विषाणु के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस नये स्वरूप को डेल्टा प्लस का नाम दिया गया है जिसका विकास डेल्टा विषाणु से हुआ है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक अभी तक महाराष्ट्र में 21, मध्य प्रदेश में 6, तमिलनाडु में 3, केरल में 3 और पंजाब, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर में डेल्टा प्लस से संक्रमित 1-1 मरीजों में इसकी पुष्टि हुई है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कोविड-19 के इस नये स्वरूप से सतर्क रहने का परामर्श जारी कर दिया है। दरअसल, कोविड-19 विषाणु अभी तक दुनियाभर के महामारी और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए रहस्यमय बना हुआ है । स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आज से करीब 100 साल पहले आए स्पेनिश फ्लू ने भी करोड़ों लोगों को अपना निवाला बनाया था। संतोष की बात यह थी कि एक-दो साल के दौरान ही स्पेनिश फ्लू का विषाणु कमजोर पड़कर मामूली...
योग साधना द्वारा जीवन का विकास
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
योग साधना द्वारा जीवन विकास योग का नाम सुनते ही कितने ही लोग चौंक उठते हैं उनकी निगाह में यह एक ऐसी चीज है जिसे लम्बी जटा वाला और मृग चर्मधारी साधु जंगलों या गुफाओं में किया करते हैं। इसलिये वे सोचते हैं कि ऐसी चीज से हमारा क्या सम्बन्ध? हम उसकी चर्चा ही क्यों करें? पर ऐसे विचार इस विषय में उन्हीं लोगों के होते हैं जिन्होंने कभी इसे सोचने-विचारने का कष्ट नहीं किया। अन्यथा योग जीवन की एक सहज, स्वाभाविक अवस्था है जिसका उद्देश्य समस्त मानवीय इन्द्रियों और शक्तियों का उचित रूप से विकास करना और उनको एक नियम में चलाना है। इसीलिये योग शास्त्र में “चित्त वृत्तियों का निरोध” करना ही योग बतलाया गया है। गीता में ‘कर्म की कुशलता’ का नाम योग है तथा ‘सुख-दुख के विषय में समता की बुद्धि रखने’ को भी योग बतलाया गया है। इसलिये यह समझना कोरा भ्रम है कि समाधि चढ़ाकर, पृथ्वी में गड्ढा खोदकर बैठ जाना ही योग का लक्षण है। योग का उद्देश्य तो वही है जो योग शास्त्र में या गीता में बतलाया गया है। हाँ इस उद्देश्य को पूरा करने की विधियाँ अनेक हैं, उनमें से जिसको जो अपनी प्रकृति और रुचि के अनुकूल जान पड़े वह उसी...
हमारी संस्कृति, जयतु संस्कृतं
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
एक ही अक्षर से बना श्लोक..................... * एक ही अक्षर से बना श्लोक पढ़ा है कभी..?? यदि नहीं, तो लीजिए........ . "कः कौ के केककेकाकः काककाकाककः ककः। काकः काकः ककः काकः कुकाकः काककः कुकः॥" . अर्थात् - परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है।
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
वैश्विक कोरोना महामारी से बचाव के रूप में सोशल डिस्टेंसिंग के धार्मिक एवं सांस्कृतिक सम्प्रत्यय का अध्ययन
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
प्रस्तावना - भारत सहित आज दुनिया के लगभग सभी देश कोरोना वायरस की विभीषिका का सामना कर रहे हैं। इसके संक्रमण से बचने के लिए "सोशल डिस्टेंस" को आशा भरी नजर से देखा जा रहा है। सभी से यह उम्मीद की जा रही है कि, वे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें, भीड़भाड़ से बचें, जिससे तेजी से फैल रहे वायरस के संक्रमण को कम किया जा सके| चीन के वुहान प्रांत से शुरु हुआ यह विषाणु आज संपूर्ण विश्व को संक्रमित कर चुका है। विश्व के विकसित देश, जिनकी स्वास्थ्य व्यवस्था अत्यंत उन्नत है, उनको भी कोरोना महामारी ने असहाय कर दिया है। ऐसे में जब इस आपदा का कोई समाधान नहीं मिल रहा है, " सोशल डिस्टेंसिंग" को मानना और इसका पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है| कोविड-19 के पूर्व संपूर्ण दुनिया पहले भी महामारीयो का दंश झेल चुकी है। इलाज के अभाव में लाखों लोग जान गवा चुके हैं। जैसे- प्लेग, चेचक, हैजा/कालरा, स्वाइन फ्लू, सार्स इत्यादि। भारत के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि, हम भारतीय महामारीओं के संपर्क में बहुत कम ही आए हैं। भारतीय इतिहास में सबसे अधिक मौतें 18वीं सदी में हैजों की वजह से हुई है। ...
अध्यापक शिक्षा का भारतीयकरण
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
अध्यापक शिक्षा का भारतीयकरण प्रस्तावना भारत में शिक्षा, भारत की महान सांस्कृतिक परम्परा और सभ्यता का दर्पण है। यह हमारी भव्य विकसित सभ्यता का साक्षात प्रमाण भी है। यही कारण है कि, भारतीय समाज के विकास और उसमें होने वाले परिवर्तनों की रूपरेखा में हम शिक्षा और उसकी भूमिका को निरंतर विकासशील पाते हैं। भारत की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परम्परा विश्व इतिहास में प्राचीनतम है। प्राचीन काल में शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया गया था। भारत ‘विश्वगुरु’ की उपाधि से विभूषित था। भारत की प्राचीन शिक्षा, आध्यात्मिकता पर आधारित पद्धति थी। शिक्षा, मुक्ति एवं आत्मबोध का ज्ञान-उपार्जन करने का साधन थी। प्राचीन शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली और विद्यार्थी- शिक्षक सम्बंध- भारतीय शिक्षा में आचार्य का स्थान बड़ा ही गौरव का था। उनका बड़ा आदर और सम्मान होता था। अध्यापक, छात्रों का चरित्र निर्माण, उनके लिए भोजनवस्त्र का प्रबंध, रुग्ण छात्रों की चिकित्सा, शुश्रूषा करते थे। कुल में सम्मिलित ब्रह्मचारी मात्र को आचार्य अपने परिवार का अंग मानते थे और उनसे वैसा ही व्यवहार रखते थे। आचार्य धर्मबुद्धि से नि:शुल्क शिक्...
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा दुष्टों की वंदना
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥ भावार्थ:-जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टों को (हजार मुख वाले) शेषजी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराए दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं॥4॥
इस समय का सबसे बड़ा सवाल- क्या कोरोना की तीसरी वेव आएगी? ज़वाब- बिल्कुल आएगी क्यों आएगी? इसलिये आएगी क्योंकि सब आम जन को अपेक्षा है कि तथाकथित तीसरी वेव को रोकने और उससे निपटने के प्रयास निम्नलिखित 5 करें- 1.सरकार 2.स्वास्थ्य विभाग 3.पुलिस 4.प्रशासन 5.सेना और -- आप क्या करेंगे? -बाजार खुलते ही बगैर काम के भी वहां जाएंगे और ठोड़ी पर मास्क लटकाकर ज्ञान बांटेंगे। - सब्जी मंडी में बगैर मास्क के घूमेंगे और यहां वहां थूकेंगे। -हमें तो एक बार हो चुका है,ये कहकर चौड़े होकर, नियमों का पालन करने वालों का मज़ाक उड़ाएंगे। -हमें तो आज तक बुखार भी नही हुआ ये कहते हुए नाई की दुकान पर सबके ऊपर खांसते रहेंगे। - बगैर लाइन के हर दुकान पर एक दूसरे से सटते हुए खरीदारी करेंगे - मौका मिलते ही पार्टी करेंगे और फिर जब वेव आएगी तो उपरोक्त पांचों को जी भरकर कोसेंगे । सुरक्षित रहिये, स्वस्थ रहिये ।
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
इस समय का सबसे बड़ा सवाल- क्या कोरोना की तीसरी वेव आएगी? ज़वाब- बिल्कुल आएगी क्यों आएगी? इसलिये आएगी क्योंकि सब आम जन को अपेक्षा है कि तथाकथित तीसरी वेव को रोकने और उससे निपटने के प्रयास निम्नलिखित 5 करें- 1.सरकार 2.स्वास्थ्य विभाग 3.पुलिस 4.प्रशासन 5.सेना और -- आप क्या करेंगे? -बाजार खुलते ही बगैर काम के भी वहां जाएंगे और ठोड़ी पर मास्क लटकाकर ज्ञान बांटेंगे। - सब्जी मंडी में बगैर मास्क के घूमेंगे और यहां वहां थूकेंगे। -हमें तो एक बार हो चुका है,ये कहकर चौड़े होकर, नियमों का पालन करने वालों का मज़ाक उड़ाएंगे। -हमें तो आज तक बुखार भी नही हुआ ये कहते हुए नाई की दुकान पर सबके ऊपर खांसते रहेंगे। - बगैर लाइन के हर दुकान पर एक दूसरे से सटते हुए खरीदारी करेंगे - मौका मिलते ही पार्टी करेंगे और फिर जब वेव आएगी तो उपरोक्त पांचों को जी भरकर कोसेंगे । सुरक्षित रहिये, स्वस्थ रहिये ।
पंजाब और केरल समेत पांच राज्यों के स्कूलों को सर्वोच्च रैंकिंग
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
निंदा में जो रस है वह अतुल्य है। स्तुति में अहंकार की अतुल्य पुष्टि होती है। निंदा दूसरों की। स्तुति अपनी। यही संसार है। लक्ष्मण ने राम से पूंछा कि माया क्या है। राम जी ने एक लाइन वाला उत्तर दिया: मैं और मोर तोर तै माया। मैं और मेरा - इसकी स्तुति। तै और तेरा - इसकी निंदा। सारा संसार के इसी के इर्द गिर्द घूमता है। सारा जीवन इसी के चारों तरफ घूमता है।
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
*सोचियेगा जरूर* *#एक_अंधा...* भीख मांगता हुआ राजा के द्वार पर पंहुचा। *राजा को दया आ गयी,* राजा ने प्रधानमंत्री से कहा,- *"यह भिक्षुक जन्मान्ध नहीं है, यह ठीक हो सकता है, इसे राजवैद्य के पास ले चलो।"* रास्ते में मंत्री कहता है, "महाराज *यह भिक्षुक शरीर से हृष्ट-पुष्ट है,* यदि इसकी रोशनी लौट आयी तो इसे *आपका सारा भ्र्ष्टाचार दिखेगा*, आपकी शानोशौकत और फिजूलखर्ची दिखेगी। *आपके राजमहल की विलासिता और रनिवास का अथाह खर्च दिखेगा,* इसे यह भी दिखेगा कि जनता भूख और प्यास से तड़प रही है, सूखे से अनाज का उत्पादन हुआ ही नहीं, और आपके *सैनिक पहले से चौगुना लगान वसूल रहे हैं।* शाही खर्चे में बढ़ोत्तरी के कारण *राजकोष रिक्त हो रहा है,* जिसकी भरपाई हम सेना में कटौती करके कर रहे हैं, इससे हजारों *सैनिक और कर्मचारी बेरोजगार* हो गए हैं। ठीक होने पर यह *भी औरों की तरह ही रोजगार की मांग करेगा* और आपका ही विरोधी बन जायेगा। मेरी मानिये तो... *_यह आपसे मात्र दो वक्त का भोजन ही तो मांगता है,_* इसे आप राजमहल में बैठाकर *मुफ्त में सुबह-शाम भोजन कराइये,* और दिन भर इसे *घूमने के लिए छोड़ दीजिये।* यह _पूरे राज्य में आपका गुणगान करता फिरेगा,_ कि... *राजा बहुत न्यायी हैं, बहुत ही दयावान और परोपकारी हैं।* इस तरह *मुफ्त में खिलाने से आपका संकट कम होगा* और... आप लंबे समय तक शासन कर सकेंगे।" *राजा को यह बात समझ में आ गयी,* वह वापस अंधे के पास गया और दोनों उसे उठाकर राजमहल ले आये। अब *अँधा राजा का पूरे राज्य में गुणगान करता फिरता है,* उसे यह नहीं पता कि राजा ने उसके साथ धूर्तता की है, *छल किया है,* _वह ठीक होकर स्वयं कमा कर अपनी आँखों से संसार का आनंद ले सकता था।_ *यही हाल सरकारें करती हैं, हमे मुफ्त का लालच देती हैं,* किंतु... _आँखों की रोशनी (अच्छी शिक्षा व रोजगार) नहीं देतीं,_ जिससे कि हम उनका भ्रष्टाचार देख पाएं, उनकी फिजूलखर्जी और गुंडागर्दी देख पाएं, उनका *शोषण और अन्याय देख पाएं।* और हम *अंधे की तरह उनका गुणगान करते हैं, कि राजा मुफ्त में सबको सामान देते हैं।* हम यह नहीं सोचते कि यदि हमें *अच्छी शिक्षा और रोजगार सरकारें दें* तो... हमें उनकी खैरात की जरूरत न होगी, हम स्वतः ही सब खरीद सकते हैं। पर... *सभी अंधे जो ठहरे,* केवल मुफ्त की चीजें ही हमें दिखती हैं। *सोचियेगा जरूर*
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
*सोचियेगा जरूर* *#एक_अंधा...* भीख मांगता हुआ राजा के द्वार पर पंहुचा। *राजा को दया आ गयी,* राजा ने प्रधानमंत्री से कहा,- *"यह भिक्षुक जन्मान्ध नहीं है, यह ठीक हो सकता है, इसे राजवैद्य के पास ले चलो।"* रास्ते में मंत्री कहता है, "महाराज *यह भिक्षुक शरीर से हृष्ट-पुष्ट है,* यदि इसकी रोशनी लौट आयी तो इसे *आपका सारा भ्र्ष्टाचार दिखेगा*, आपकी शानोशौकत और फिजूलखर्ची दिखेगी। *आपके राजमहल की विलासिता और रनिवास का अथाह खर्च दिखेगा,* इसे यह भी दिखेगा कि जनता भूख और प्यास से तड़प रही है, सूखे से अनाज का उत्पादन हुआ ही नहीं, और आपके *सैनिक पहले से चौगुना लगान वसूल रहे हैं।* शाही खर्चे में बढ़ोत्तरी के कारण *राजकोष रिक्त हो रहा है,* जिसकी भरपाई हम सेना में कटौती करके कर रहे हैं, इससे हजारों *सैनिक और कर्मचारी बेरोजगार* हो गए हैं। ठीक होने पर यह *भी औरों की तरह ही रोजगार की मांग करेगा* और आपका ही विरोधी बन जायेगा। मेरी मानिये तो... *_यह आपसे मात्र दो वक्त का भोजन ही तो मांगता है,_* इसे आप राजमहल में बैठाकर *मुफ्त में सुबह-शाम भोजन कराइये,* और दिन भर इसे *घूमने के लिए छोड़ द...
आज विश्व पर्यावरण दिवस है, मित्रो, चूकिं हम आध्यात्मिक प्राणी भी हैं, इसलिए पर्यावरण को अध्यात्म की दृष्टि से समझने की कोशिश करेंगे। पर्यावरण, वातावरण या प्रकृति, ये शब्द अर्थ की दृष्टि से काफी कुछ मिलते-जुलते हैं, हमारे ऋषियों ने पंच महाभूत तथा अष्टप्रकृति के नाम से जिन मुख्य तत्वों को माना है। उन्हें हम आज भी आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, सूर्य और चंद्रमा के रूप में देख सकते हैं, पर्यावरण शुध्दि और संतुलन की दृष्टि से यज्ञ का महत्व आज वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है, अत: उपर्युक्त तत्वों में यज्र्ञकत्ता को भी आठवें क्रम पर स्वीकार किया गया था, ऋषियों ने आध्यात्मिक पर्यावरण को भी भूगोलीय व खगोलीय पर्यावरण के अभिन्न हिस्से के रूप में माना। वैदिक शान्ति पाठ में भी हम इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों की शान्ति और समन्वय की प्रार्थना अथवा कामना अनादिकाल से करते आये हैं, यह स्वाभाविक ही है, कि इसी वैदिक पृष्ठभूमि पर भारतीय संस्कृति के अमर गायक के रूप में अवतरित होने के कारण महाकवि कालिदासजी ने भी बड़े रोचक, प्रभावी तथा व्यावहारिक ढंग से पर्यावरण के प्रति संवेदना तथा सजगता की बातें बतायीं। भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश माना जाता है, ठीक इसी प्रकार यह ऋषि प्रधान देश भी है, कृषि और ऋषि के बिना इस राष्ट्र की कल्पना असंभव है, वर्षा के बिना कृषि तथा ज्ञान वर्षा के बिना ऋषि का कोई महत्व नहीं है, दोनों हो तो एक स्वस्थ राष्ट्रीय पर्यावरण निर्मित हो जाता है, वर्षा एक पर्व के रूप में हिन्दुस्तान में देखी जाती रही है, वर्षा मेघ के बिना कैसे संभव होगी? मेघों को हम स्थायी कृषिमंत्री, पर्यावरण दूत या प्राणदाता के रूप में जानते तथा मानते आयें हैं, वह अनादिकाल से समृध्दि शान्ति तथा सुसंतुलित पर्यावरण का आधार रहा है, भारतीय जनमानस हमेशा ही यह प्रार्थना करता रहा है कि समय पर वर्षा हो, पृथ्वी हरी-भरी रहे, अकाल न पड़े और सर्वजन निर्भय रहें। काले वर्षतु पर्जन्य: पृथिवी शस्यशालिनी। देशोऽयं क्षोभरहित: प्रजा सन्तु च निर्भया:।। महाकवि कालिदासजी की अमरकृति "मेघदूत" भी इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाला एक सुन्दर विश्वगीत है, छत्तीसगढ़ के 'रामगिरि' (रामगढ़) की घनी छाया वाले उन शुध्द तथा पवित्र जलाशयों वाली वादियों से मेघ उठते हैं, जो कभी भगवती सीताजी के स्नान से पवित्रतर हुये थे। अर्थर्ववेद के अनुसार जो धरती माता, नाना धर्मावलम्बियों, विविध भाषा-भाषियों की गोद है, तथा कामधेनु के समान उन सबकी इच्छायें भी पूरी करती है, कालिदासजी के मेघ ग्रीष्म ऋतु से सन्तप्त इसी धरती की प्यास बुझाने के पश्चात उसे हरी-भरी फसल और वनस्पति के पर्यावरण से तो शृंगारित करते ही हैं, धनधान्य से सम्पन्न भी करते हैं। कृषक स्त्रियां इस मेघ देवता को बड़ी हसरत भरी निगाहों से इसीलिये देखती हैं, क्योंकि सफल खेती का पूरा दारोमदार इसी पर तो टिका है, वही पालक और वही पोषक भी है, यह सुखद आश्चर्य है, कि कवि कालिदासजी के साहित्य में सीताजी, शकुन्तलाजी, पार्वतीजी तथा लक्ष्मीजी जो पर्यावरण के चार मुख्य घटक- पृथिवी, वन, पर्वत तथा समुद्र की पुत्रियां हैं। सामाजिक दायित्व की चर्चा को हम आधुनिक, वैज्ञानिक अथवा पश्चिम की खोजपूर्ण मौलिक देन मानकर वस्तुत: गलतफहमी या खुशफहमी के शिकार हैं, भाई-बहनों हम आपको प्रकृति प्रेमी पुराणे नाटकों के कुछ झलक दिखलाते है, जो ध्यानपूर्वक पढ़ना, विश्वप्रसिध्द शकुन्तला नाटक की नायिका शकुन्तला तो शकुन्त अर्थात् पक्षियों से लालित-पालित होने के कारण ही तो शकुन्तला कहलायीं। जो वृक्षों की सिंचाई के पूर्व पानी पीना अनावश्यक मानती थी और सजने के लिए फूल-पत्तियों तक नहीं तोड़ती थी, पहली बार फूल खिलने पर वे उत्सव मनाती थी, मृगवधू बिना परेशानी के प्रथम संतान को जन्म देकर सकुशल रहे, ये भार ससुराल जाते समय अपने धर्मपिता कण्व पर डालती है, मृग का वह शिशु, जिसको शकुन्तला ने पाला-पोसा, बिदाई के समय उसका पल्लू पकड़ कर मानो जाने से रोकता है। उधर कुमारसंभवम् नाटक की पार्वती के हाथों से हिरण निश्चिन्त होकर दाना खाते हैं, 'मेघदूतम्' नाटक की यक्षपत्नी हथेलियों के ताल दे कर मोरों को सानन्द नाचने के लिए प्रेरित करती है, इसलिये वे सफल तथा प्रसन्न रहती है, रघुवंश में महाराजा दिलीप छाया की तरह नंदिनी गौ का अनुगमन करते हुए सेवा करते रहें, नंदिनी के चलने पर चलते, बैठने पर बैठते, पानी पीने पर पानी पीते तथा सोने पर सो जाते। यही कारण है कि रास्ते के आस-पास वृक्षों पर बैठे पक्षीगण राजा का जय-जयकार करते हैं, महाराजा दिलीप जंगल में प्रवेश करते ही 'जंगल में मंगल' का दृश्य दिखाई देने लगा, महाराजा दिलीप के समय में शक्तिशाली प्राणियों ने कमजोरों को दबाना बंद कर दिया, बिना वर्षा के जंगल में लगी दावाग्नि शांत हो गई तथा वृक्षों में फूलों और फलों में आशातीत वृध्दि हो गयीं, लगभग यही दृश्य हिमालय पर्वत पर देवी पार्वतीजी के तपस्या करते समय स्थापित हो गया। भाई-बहनों, कुछ अज्ञानी किन्तु प्रभावशाली लोग अच्छे खासे मंगल को जंगल में बदलने पर उतारू हैं, पृथ्वी बचाओं सम्मेलनो में घड़ियाली आंसू बहाते है, उन्हें कवि कालिदास साहित्य के इस जंगल में मंगल' संबंधी न केवल सराहनीय अपितु अनुकरणीय संदेश को ग्रहण करना चाहियें, हिमालय हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का उच्चतम प्रतीक होने के साथ-साथ भूगोल, खगोल और पर्यावरण का भी सर्वोच्च नियामक है। यदि इसे देवताओं का भी आत्मस्वरूप मानकर, पूर्व से पश्चिम तक पृथिवी को नापने वाले 'मानदण्ड' (मीटर) के रूप में तथा अनन्त रत्नों के अखण्ड भण्डार के रूप में इसकी अर्चना और वंदना करने वाला कोई प्रथम राष्ट्रकवि हुयें तो वे कालिदासजी हैं, उनके पर्यावरण के प्रति सजग उनके समान कोई कवि नहीं हुयें। अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:।। पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थित: पृथिव्या इव मानदण्ड:।। उत्तरांचल की यात्रा के अध्ययन के दौरान वृक्षमित्र तथा चिपको आंदोलन के प्रणेता वनर्षि सुन्दरलालजी बहुगुणा के विषय में इन पंक्तियों के लेखक ने जो जाना, बड़ा पूज्य भाव उनके प्रति पैदा हुआ, लगता है- कुमारसंभव, अभिज्ञान शाकुन्तल, मेघदूत तथा रघुवंश आदि के नाटको में हिमालयी पर्यावरण का मनोमुग्धकारी किन्तु व्यावहारिक वर्णन करके कालिदासजी ने नाटककारों का मार्गदर्शन कर दिया हो। देवाधिदेव महादेवजी ने प्रदूषित विष को पीने के कारण ही महामृत्युंजय कहलायें, अब समुद्रमन्थन को कोरा मिथक मानने की मान्यता को वैज्ञानिक भी ध्वस्त कर चुके हैं, आकाश तथा वायु सहित आठ प्रकृति उनके प्रत्यक्ष रूप है, ये पौराणिक बातें नास्तिकों के मुंह पर करारा तमाचा है, वे समस्त वन्य पशुओं के स्वामी होने के कारण ही भगवान् भोलेनाथ पशुपति कहे जाते हैं। भगवान् शिवजी समस्त प्राणिमात्र के प्राणनाथ है, इसलिये भूतनाथ और विश्वनाथ माने गयें हैं, ये नाम बड़े सार्थक हैं, प्रकृति प्रेमियों को पर्यावरण की दृष्टि से चिन्तन और मनन करना चाहियें, भगवान् भोलेनाथ कवि कालिदासजी के आराध्य भी हैं, प्राय: हर ग्रन्थ के शुभारंभ के मंगल श्लोकों में कवि ने उन्हें एक व्यापक पर्यावरणीय देव के रूप में स्मरण किया हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल का नंदीपाठ तो प्रकृति संवेदना का जीवन्त और शाश्वत शिलालेख ही है, सिर पर गंगाजल और तीसरी ऑंख में अग्नि, माथे पर चन्द्रमा में अमृत, तथा कण्ठ में महाकाल विष को एक साथ धारण कर संतुलन एवं समन्वय के अद्वितीय आदर्श हैं भगवान् शिवजी, अमृत-विष तथा आग-पानी जैसे सर्वथा विरोधी प्राकृतिक उपादनों में तालमेल रखना एक चमत्कार है। सज्जनों, उनके पारिवारिक वाहन प्रतीकों में सामंजस्य भी दूसरा चमत्कार है, स्वयं का बैल, माता पार्वतीजी का सिंह, गणेश के चूहे और भोलेनाथ के नाग, कितना सन्तुलन, स्वयं शिवजी के हृदय पर हार के रूप में सर्प और कार्तिकेय के वाहन मोर हैं जो ये परस्पर नित्य बैरी हैं, किन्तु रहते कैसे समन्वय से हैं, वन्य प्राणी सुरक्षा सप्ताह या वन्य प्राणी सुरक्षा महीना मनाने वाले लोगों को शास्त्रों से प्राणियों में आजीवन समन्वय, सुरक्षा एवं सुखी जीवन की प्रेरणा लेनी चाहिये। कालिदासजी रघुवंश में वर्णन करते हैं कि पार्वती के पालित पुत्र देवदारु के तने की छाल को किसी जंगली हाथी ने रगड़ दिया, अपने शरीर को उससे रगड़ कर सील दिया, कार्तिकेय से पहले जन्मे प्रिय देवदारु वृक्ष की इस पीड़ा को न सह सकने वाली देवी पार्वतीजी तब तक रोती रहीं और खाना नहीं खाया जब तक त्रिशूलपाणि शिवजी ने अपने कुम्भोदर नामक सेवक को शेर के रूप में उस वृक्ष पुत्र की रक्षा में नियुक्त न कर दिया। कदाचित् तभी से ये जनश्रुति अस्तित्व में आई कि शेर जंगल का राजा है,' प्राणवान और संवेदनशील वनस्पतियों की रक्षा का यह विशिष्ट तथा प्रतीकात्मक तरीका है, आज वन उजड़ रहे हैं, शेर समेत अन्य वनप्राणियों को मारा जा रहा है, भयंकर सूखे के दौर से हम गुजर रहे हैं, वनों के अभाव में वर्षा कैसे होगी? न रहेंगे शेर, न रहेंगे वन तो वर्षा कैसे होगी? प्रकृति तथा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यदि कालिदासीय प्रबंधन को हम रेखांकित कर जीवन में उतारें तो देश व जगत का भी भला होगा, आज के दौर में केवल पर्यावरण दिवस मनाकर ही अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकते, अवैधानिक सभी प्रकार के उत्खनन को रोकना होगा, वृक्षों को लगाना होगा, अन्न को उपजाने के लिये देशी खाद का इस्तेमाल करें। प्लास्टिक थेलीयों का पूर्ण बहिष्कार करें, हम जहाँ पर रहें वहाँ स्वस्थता का पूर्ण ख्याल रखें, योग और प्राणायाम को जीवन में अपनायें, ताकि प्रदुषण से आपके शरीर को कोई नुकसान न हो, कम हो, अंग्रेजी दवाओं से परहेज करें, और आयुर्वेद से मार्गदर्शन लें, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग कर देश की तरक्की में अपना योगदान दे, जंगलों को न काटे, जंगलों में सभी तरह के वृक्ष लगायें। भाई-बहनों आज विश्व पर्यावरण दिवस पर संकल्प लिजिये की हम पूरी शक्ति से पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिये सभी तरह के नियमों का पालन करेंगे, कल हमने आपको बताया था कि विश्व को पर्यावरण का बहुत बड़ा संकट है, जिससे सुनामी आती है, ज्वालामुखी फूटते है, भूकम्प का आना, अनावृषटि और अतिवृष्टि का होना, कई तरह की बीमारीयों का जन्म, वायु में कार्बाइड का बढना और भी हजारों तरह की तकलीफ है, जो पर्यावरण के बिगड़ने से हो रही है। आपके संकल्प से ही कुछ अच्छा हो सकता है, वरना आज के दिन श्मशानी वैराग्य की तरह आज हलचल करोगे, बड़े सुहावने भाषण दोगे और कल से फिर पर्यावरण के प्रति लापरवाह हो जाओगे, जो विगत 44 वर्षों से यही हो रहा है, अतः जागो और सरकार के साथ अपनी-अपनी जिम्मेदारी सुनिश्चित करें।
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Higher Education During Covid 19 Pandemic Impact on Teaching and Learning पुस्तक में हमारा चैप्टर
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
Validity period of Teachers Eligibility Test qualifying certificate extended fromसीटेट की वैधता अब आजीवन 7 years to lifetime - Shri Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप