*हर असफलता के बाद हमें दुगनी क्रियाशीलता के साथ आगे बढ़ना चाहिए, यह पुरुषार्थ की चुनौती है। जो एक ही ठोकर में निराश होकर बैठ गया, जिसका आशा दीप एक ही फूँक में बुझ गया, उस दुर्बल मन व्यक्ति ने न ही जीवन का स्वरूप समझा और न संसार का।* *यहाँ पग-पग पर संघर्ष करना होता है। कदम-कदम पर साहस, धैर्य और पुरुषार्थ की परीक्षा देनी होती है। जो उस मूल्य को चुकाने के लिए तैयार न हों, उन्हें सफलता जैसे वरदान की आशा भी नहीं करनी चाहिए।"* *!!!...मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता, प्रत्युत कर्मोंमें वह जो आसक्ति और स्वार्थभाव रखता है, उनसे ही बँधता है...!!!*
*हर असफलता के बाद हमें दुगनी क्रियाशीलता के साथ आगे बढ़ना चाहिए, यह पुरुषार्थ की चुनौती है। जो एक ही ठोकर में निराश होकर बैठ गया, जिसका आशा दीप एक ही फूँक में बुझ गया, उस दुर्बल मन व्यक्ति ने न ही जीवन का स्वरूप समझा और न संसार का।*
*यहाँ पग-पग पर संघर्ष करना होता है। कदम-कदम पर साहस, धैर्य और पुरुषार्थ की परीक्षा देनी होती है। जो उस मूल्य को चुकाने के लिए तैयार न हों, उन्हें सफलता जैसे वरदान की आशा भी नहीं करनी चाहिए।"*
*!!!...मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता, प्रत्युत कर्मोंमें वह जो आसक्ति और स्वार्थभाव रखता है, उनसे ही बँधता है...!!!*

Nyc post sir
जवाब देंहटाएं