आज की प्रमुख समस्या है कि बच्चे बड़ों की बात नहीं मानते , उनका सम्मान नहीं करते । थोड़ -सा गहराई से सोचने पर स्पष्ट हो जाता है कि इसके लिए माता -पिता एवं अभिभावक भी कहीं जिम्मेदार हैं ; क्योंकि उनके पास समय ही नहीं है कि वे बच्चों की बातों को सुनें , समझें व उनकी समस्याओं का सार्थक समाधान प्रस्तुत करें । साथ ही यदि व्यक्ति ही अपने जीवन के प्रति सजग -सचेष्ट न हो , तो फिर बाल निर्माण की बात और कठिन हो जाती है। इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि सबसे पहले बड़े लोग स्वयं अपने लिए समय निकालें ।अपने जीवन को समग्र रूप में समझने व सँवारने का प्रयास करें ।बच्चों पर महज उपदेश काम नहीं करते । वे बड़ों का आचरण , व्यवहार भी देखते हैं और इसका जाने -अनजाने में अनुसरण करते हैं।यदि बड़े स्वयं ही नियम का पालन नहीं कर रहे हैं , परन्तु बच्चों को ज्ञान -उपदेश दे रहे हैं , तो इसका प्रभाव संदिग्ध ही रहता है । भय या दवाब वस बच्चे तात्कालिक रूप से इनका पालन कर भी लें , लेकिन इसका स्वस्थ एवं स्थाई प्रभाव नही पड़ता। बच्चों के निर्माण में उनके प्रति संवेदनशील रवैया रखना सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।


 

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